साल जेल में सड़ता रहा बेगुनाह: पुलिस की गलती से जिंदगी बर्बाद, 200 करोड़ मुआवजे का दावा

साल जेल में सड़ता रहा बेगुनाह: पुलिस की गलती से जिंदगी बर्बाद, 200 करोड़ मुआवजे का दावा

बेगुनाह व्यक्ति को पुलिस की गलती से 6 साल जेल में रहना पड़ा। पिता का निधन, पत्नी का साथ छूटा, बेटियां अनाथालय पहुँचीं। अब उसने 200 करोड़ रुपये मुआवजे की मांग की है। पढ़ें पूरी खबर।

बेगुनाह को जेल में 6 साल: न्याय व्यवस्था पर शक और 200 करोड़ का हर्जाना
भारत में न्याय व्यवस्था के बारे में हमेशा से ही बहस होती रही है। कई बार ऐसे मामले सामने आते हैं, जब असली अपराधी खुलेआम घूमते रहते हैं और निर्दोष लोग सलाखों के पीछे सड़ते रहते हैं। हाल ही में एक ऐसा ही दिल दहला देने वाला देखा जा रहा है, जिसने पूरे देश का ध्यान खींचा है।

क्या है पूरा मामला?

2009 में उत्तर प्रदेश के ग़ाज़ीपुर रेलवे स्टेशन पर एक घटना हुई थी। इस मामले में पुलिस निर्दोष “गोपी” की जगह गलती से “गोपाल” नामक निर्दोष व्यक्ति को गिरफ्तार कर लिया और उसके ऊपर संगीन आरोप लगा दिए। पुलिस की जांच और कार्रवाई में हुई इस चूक का नतीजा यह हुआ कि गोपाल को बिना किसी सबूत के जेल में डाल दिया गया।

गोपाल ने अपनी ज़िंदगी के 6 साल जेल की सलाखों के पीछे गुजरे। इस समय उसकी ज़िंदगी पूरी तरह से बर्बाद हो गई।

परिवार पर टूटा दुखों का पहाड़

जब गोपाल जेल में था, तब उसके परिवार पर भी दुखों का पहाड़ टूट पड़ा।

उसके पिता का देहांत हो गया।

पत्नी ने उसे छोड़ दिया और हमेशा के लिए चली गई।

उसकी दो छोटी बेटियों को अनाथालय भेज दिया गया।

विचार करें, एक अंदरूनी व्यक्ति पर जबरन आरोप लगाकर जेल में डाल दिया जाए और उसकी पूरी दुनिया बर्बाद हो जाए, तो वह किस हाल में होगा।

अपनी बेगुनाही का सबूत खुद किया

भीड़ के दबाव के बाद भी गोपाल ने हार नहीं मानी। उसने आरटीआई (सूचना का अधिकार) के तहत जानकारी इकट्ठा की और अपने केस के तथ्यों को आगे पेश किया। धीरे-धीरे सच सामने आया कि पुलिस ने गलत व्यक्ति को आरोपी बना दिया था। अंततः वह अदालत में अपनी बेगुनाही साबित करने में सफल रहा और बरी कर दिया गया।

बिल्कुल यह है पर अब यह सवाल उठता है कि अब ये खोए हुए 6 वर्षों की भरपाई कौन करेगा।

200 करोड़ का दावा

गोपाल ने अदालत में याचिका दायर करके 200 करोड़ रुपये का मुआवज़ा (हर्जाना) मांगा है। उसका तर्क है कि पुलिस, वकील और न्याय व्यवस्था की लापरवाही की वजह से उसने अपनी जिंदगी के कीमती वर्ष गंवा दिए। न सिर्फ उसकी ज़िंदगी तबाह हो गई बल्कि उसके परिवार का भी बुरा हाल हो गया।

आज जब वह जेल से वापस आया है, तो उसके पास कुछ भी नहीं बचा। माँ-बाप का सहारा छिन गया, पत्नी ने साथ छोड़ दिया और बेटियाँ भी अनाथालय में पल रही हैं। ऐसे में उसने अदालत से पूछा है कि क्या उसे उसकी बरबाद हुई ज़िंदगी के लिए इंसाफ मिलेगा?

न्याय व्यवस्था पर सवाल

इस घटना ने न्याय व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं।

1. पुलिस जांच कितनी विश्वसनीय है?

यदि पुलिस की लापरवाही से एक निर्दोष 6 साल जेल में रहता है, तो यह समाज के लिए बहुत खतरनाक स्थिति है।
2. मुआवज़े की व्यवस्था क्यों नहीं?

विकसित देशों में यदि किसी निर्दोष को गलत तरीके से सज़ा मिलती है, तो उसे मुआवज़ा और विशेष सुविधाएं दी जाती हैं। पर भारत में ऐसे लिए कोई मजबूत प्रावधान नहीं है।
3. जिम्मेदार कौन?


अगर पुलिस की गलती से कोई की जिंदगी बर्बाद हो जाती है, तो क्या “माफ़ी” काफ़ी है? क्या पुलिस अधिकारियों पर कोई कार्रवाई नहीं होनी चाहिए?

समाज की प्रतिक्रिया

 

इस मामले ने आम जनता के बीच गुस्सा और सहानुभूति दोनों पैदा की है। सोशल मीडिया पर लोग कह रहे हैं कि अगर गोपाल जैसे निर्दोष को न्याय नहीं मिला, तो आम आदमी किस पर भरोसा करेगै?

लोगों की राय है कि अदालत को गोपाल को उचित हर्जाना देना चाहिए ताकि भविष्य में ऐसी गलतियों को दोहराने से बचा जा सके।

हर्जाना वसूलने की ज़रूरत

गोपाल का 200 करोड़ का दावा बड़ा ज़रूर लगता है, लेकिन अगर उसकी बर्बाद हुई जिंदगी, खोया हुआ परिवार और मानसिक पीड़ा को देखा जाए, तो यह रकम भी कम है। असली सवाल यह है कि क्या पैसे से उसका टूटा हुआ परिवार वापस आ सकता है? शायद नहीं। लेकिन यह मुआवज़ा कम से कम उसे नई शुरुआत करने का सहारा ज़रूर दे सकता है।

निष्कर्ष

यह मामला सिर्फ एक व्यक्ति का नहीं है, बल्कि पूरे समाज के लिए एक सबक है। यह हमें सोचने पर मजबूर करता है कि न्याय व्यवस्था में सुधार की कितनी ज़रूरत है।

निर्दोष लोगों को फंसाने वाली लापरवाही पर सख्त कार्रवाई होनी चाहिए।

मुआवज़ा देने की कानूनी व्यवस्था बनाई जानी चाहिए।

पुलिस और जांच एजेंसियों को अधिक पारदर्शी और जवाबदेह बनाया जाना चाहिए

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